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दुश्मन के रडार होंगे निशाने पर, वायुसेना के लिए ग्राउंड-बेस्ड जैमर मंजूर

September 7, 2026 Source: News Katha

दुश्मन के रडार होंगे निशाने पर, वायुसेना के लिए ग्राउंड-बेस्ड जैमर मंजूर
रक्षा अधिग्रहण परिषद ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में लगभग 1.10 लाख करोड़ रुपये के अधिग्रहण प्रस्तावों को मंजूरी दी. सेना, नौसेना और वायु सेना के लिए स्वदेशी उपकरणों को हरी झंडी मिली. 7 सितंबर 2026 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी DAC की बैठक हुई. बैठक में सशस्त्र बलों के विभिन्न अधिग्रहण प्रस्तावों को सैद्धांतिक प्रशासनिक मंजूरी यानी एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (AON) दी गई. इन प्रस्तावों की अनुमानित लागत 1 लाख 10 हजार करोड़ रुपये है. यह फैसला भारतीय रक्षा बलों की लड़ाकू क्षमता बढ़ाने और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. सबसे खास बात यह है कि कुल मंजूरियों में से करीब 98 प्रतिशत खरीद भारतीय उद्योग से की जाएगी. इससे मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान को नया बल मिलेगा. थलसेना के लिए आधुनिक उपकरण भारतीय थलसेना के लिए कई महत्वपूर्ण प्रणालियों को मंजूरी दी गई. इनमें केमिकल बायोलॉजिकल रेडियोलॉजिकल एंड न्यूक्लियर यानी सीबीआरएन रेकी वाहन शामिल हैं. ये वाहन रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु एजेंटों से दूषित क्षेत्रों का पता लगाने, पहचानने, निगरानी करने और चिह्नित करने में सक्षम होंगे. उच्च गतिशीलता वाले वाहन यानी हाई मोबिलिटी व्हीकल्स (HMV) चुनौतीपूर्ण इलाकों में परिचालन क्षमता, लॉजिस्टिक सहायता और गतिशीलता बढ़ाएंगे. सेल्फ-प्रोपेल्ड मैकेनिकल माइन लेयर्स (MML) कठिन इलाकों में तेज और प्रभावी माइन बिछाने की क्षमता प्रदान करेंगे. एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) थलसेना और वायु सेना दोनों के लिए सभी इलाकों और परिचालन स्थितियों में जटिल मिशनों को अंजाम देंगे. ट्रॉल टैंक और सर्वत्र ब्रिज सिस्टम विभिन्न इलाकों में लड़ाकू संरचनाओं को मिश्रित क्रॉसिंग सुविधा उपलब्ध कराएंगे. ये सभी प्रणालियां सीमाओं पर तेजी से प्रतिक्रिया और बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करेंगी. पहाड़ी, रेगिस्तानी और मैदानी क्षेत्रों में सेना की तैयारियों को नया आयाम मिलेगा. भारतीय नौसेना के लिए अरुध्रा रडार और मरीन गैस टर्बाइन (एमजीटी) के डिजाइन, विकास तथा खरीद को मंजूरी मिली. अरुध्रा रडार विभिन्न नौसैनिक हवाई स्टेशनों पर मौजूदा एयर रूट सर्विलांस रडार की जगह लेंगे. इससे हवाई निगरानी की क्षमता और सटीकता बढ़ेगी. मरीन गैस टर्बाइन युद्धपोतों की प्रणोदन प्रणाली है. इसका स्वदेशी विकास और खरीद विदेशी विक्रेताओं पर निर्भरता कम करेगी. समुद्री क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में यह बड़ा कदम है. युद्धपोतों की गति और विश्वसनीयता में सुधार होने से हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी. भारतीय वायु सेना के लिए लड़ाकू विमानों, परिवहन विमानों और हेलीकॉप्टरों की युद्धक क्षमता बढ़ाने वाले कई प्रस्ताव पास हुए. ग्राउंड-बेस्ड मल्टी-पर्पज जैमर (जीबीएमपीजे) को मंजूरी दी गई जो दुश्मन के रडारों के खिलाफ प्रभावी जैमिंग क्षमता प्रदान करेगा. इससे इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में बढ़त मिलेगी डिफेंस फोर्सेज सिक्योर एक्सेस कार्ड (डेफसैक) सिस्टम मौजूदा कागजी पहचान पत्रों, पास और परमिट की जगह इंटरऑपरेबल रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन आधारित स्मार्ट कार्ड सिस्टम लाएगा. यह सुरक्षा व्यवस्था को आधुनिक और सुरक्षित बनाएगा. ये मंजूरी वायु सेना की बहुआयामी क्षमताओं को मजबूत करेंगी. जैमिंग सिस्टम से दुश्मन की निगरानी और संचार बाधित करने में मदद मिलेगी जबकि स्मार्ट कार्ड सिस्टम से आंतरिक सुरक्षा और पहुंच नियंत्रण बेहतर होगा. स्वदेशीकरण पर जोर और आत्मनिर्भरता की दिशा कुल मंजूरियों का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा भारतीय उद्योग से खरीदा जाएगा. यह आंकड़ा मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान की सफलता को दर्शाता है. पहले विदेशी निर्भरता ज्यादा थी लेकिन अब घरेलू कंपनियां डिजाइन, विकास और उत्पादन में आगे आ रही हैं. इससे न सिर्फ विदेशी मुद्रा बचेगी बल्कि रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे. रक्षा विनिर्माण इकोसिस्टम मजबूत होगा और निर्यात क्षमता भी बढ़ सकती है. डीएसी का यह फैसला वर्तमान सुरक्षा चुनौतियों को ध्यान में रखकर लिया गया है. सीमाओं पर तनाव, आतंकवाद और आधुनिक युद्ध की जरूरतें इन उपकरणों को जरूरी बनाती हैं. सीबीआरएन खतरों से निपटने, कठिन इलाकों में गतिशीलता बढ़ाने, समुद्री निगरानी मजबूत करने और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता विकसित करने पर फोकस साफ दिखता है. यह मंजूरी सिर्फ खरीद नहीं बल्कि दीर्घकालिक सैन्य आधुनिकीकरण की रणनीति का हिस्सा है. थलसेना, नौसेना और वायु सेना तीनों के लिए संतुलित तरीके से क्षमताएं बढ़ाई जा रही हैं. स्वदेशी उद्योग को प्राथमिकता देकर भारत वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में अपनी जगह मजबूत कर रहा है. आने वाले वर्षों में ये प्रणालियां सशस्त्र बलों की तैयारियों को नई ऊंचाई देंगी और राष्ट्र की सुरक्षा को और पुख्ता करेंगी